"स्तंभ - 177"
माओवाद के मोर्चे पर शांति की पहल....आखिर किन शर्तों पर ?
जब भी कहीं हिंसा होती है वो या तो किसी वर्चस्व आधारित लक्ष्य को समर्पित होती है अथवा वह शोषण से दबे कुचले वर्ग की अंतिम प्रतिक्रिया के रूप में परिभाषित की जा सकती है, कुछेक अपवादों को छोड़ दें तो भारत में माओवाद संबंधित हिंसा को पहली श्रेणी में परिभाषित किया जा सकता है यह और बात है कि देश में सदैव से ही एक वर्ग विशेष (सामान्यतः कम्युनिस्ट बुद्धिजीवी) ऐसा रहा है जिसने पूरी शक्ति से इस तंत्र द्वारा फैलाई गई हिंसा को दूसरी श्रेणी में परिभाषित किया है।
इस क्रम में इन बुद्धिजीवियों द्वारा बड़ी धूर्तता से इतिहास के चुनिंदा दुष्प्रचारित संदर्भो को चुनकर ऐसा दिखाया जाता रहा है कि आदि काल अथवा वैदिक काल से भारतीय समाज ने ना केवल जाति आधारित भेदभाव को सामाजिक व्यवस्था के रूप में स्वीकृति दी है अपितु यह कुव्यवस्था एवं इसके आधार पर किया गया शोषण तो सनातन धर्म के पौराणिक आख्यानों में भी वर्णित है, इसलिए देश भर में जहां कहीं भी कथित रूप से ऐसे अत्याचार के विरुद्ध किसी ने हिंसा का मार्ग चुना तो कम से कम नैतिक आधार पर नागरिकों को उसके साथ सहानभूति दिखानी ही चाहिए, भारत मे मार्क्स एवं माओ का झंडा ढ़ो रहे कम्युनिस्टों का यह दर्शन नक्सलबाड़ी से लेकर ताड़मेटला में 76 सुरक्षाकर्मियों के बलिदान तक समानांतर रूप से लागू होता है इसलिए ताड़मेटला जैसी हृदयविदारक घटना भी जेनएयू जैसे विश्वविद्यालय में कम्युनिस्ट झुकाव वाले छात्रों के लिए विषाद का नहीं अपितु उल्लास का पल बना।
फिर इस प्रपंच के अनेकों रूप हैं जिसकी अभिव्यक्ति समय समय पर निकल कर सामने आती रहती है यानी इस हिंसक विद्रोह को कथित रूप से वंचितों का संघर्ष बताने अथवा समानता की क्रांति के रूप में दर्शाने के प्रयास के अतिरिक्त भी इन बुद्धिजीवियों के कई क्षद्म स्वरूप हैं जो गाहे-बगाहे नए प्रपंच गढ़ने एवं उसके आधार पर इस कथित आंदोलन को अपना समर्थन पहुंचाते रहते हैं। इनमें से इस आंदोलन को समर्थन पहुँचाने का एक प्रयास तो शांति वार्ता की पैरोकारी के माध्यम से किया जाता रहा है, जिसके अलग अलग झंडेबरदार समय समय पर सामने भी आते रहते हैं। मूलतः यह वही लोग हैं जो विचारधारा के नाम पर सुविधानुसार थोड़ा राइट थोड़ा लेफ्ट होने का स्वांग रचते रहते हैं जिनकी मानें तो विचारधारा के नाम और उपजाई गई इस जटिल समस्या का समाधान उनकी चुटकियों पर है, आवश्यकता तो केवल उनके कहे अनुसार शांति वार्ता को मूरत रूप देने की है, फिर इस शांति वार्ता को लेकर इन झंडेबरदारों के अपने तर्क-कुतर्क भी हैं जो भी सुविधानुसार शिफ्ट होते रहते हैं।
इस क्रम में इनके द्वारा एक महत्वपूर्ण तर्क तो यह दिया जाता रहा है कि संघर्ष चाहे जिसके बीच भी हो पीसना सामान्य जनमानस को ही पड़ता है, सही मायनों में देखें तो भारत के माओवादी आंदोलन के संदर्भ में उनका यह कुतर्क उनकी धूर्तता की पराकाष्ठा है, दरसअल इसमें संशय नहीं कि समानता के इस कथित संघर्ष में आम जनमानस ही सबसे ज्यादा पीड़ित रहा है लेकिन इसके जड़ में क्या वाकई दोनों पक्षों की भूमिका है ? ऐसा तो कतई नहीं है! भारत जैसे लोकतंत्र में जहां अधिकारों विशेषकर पिछड़ों एवं आदिवासियों को लेकर समानता स्थापित करने के लिए संविधान में विशेषाधिकार की व्यवस्था हो वहां हिंसा का मार्ग चुनना आखिर कितना सही? और फिर उसी हिंसा के लिए सरकार के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष करने वालों के साथ उसका सामान्यीकरण आखिर कितना तर्कपूर्ण है ?
इस क्रम में अगला कुतर्क शांतिवार्ता से संबंधित है जिसकी ये कथित बुद्धिजीवी पुरजोर पैरवी करते आये हैं, इस प्रायोजित वार्ता को लेकर इन शांतिदूतों का तर्क यह है कि समस्या का समाधान केवल वार्ता से ही संभव है, तार्किक रूप से यह विचार ठीक भी है, समस्या इसके क्रियान्वयन में है जिसको लेकर ये शांतिदूत यह गुहार लगाते आए हैं कि इसके लिए सरकार को एक शांतिकाल की घोषणा करनी चाहिए, अब इस शांतिकाल की बुनियाद कई अन्य महत्वपूर्ण बिंदुओं पर केंद्रित है, जिसे अपने-अपने रूप से परिभाषित किया जा सकता है।
इस क्रम में माओवादियों के इन झंडेबरदारों का तर्क यह है कि चूंकि वार्ता के लिए शांतिकाल की घोषणा अनिवार्य अपयहर्ता है इसलिए सरकार को इसके लिए पहल करनी चाहिए जबकि सरकार के पक्ष की बात करें तो सुरक्षा विशेषज्ञों के मत में कमजोर पड़ते संगठन को सरकार द्वारा दिया गया ऐसा कोई भी शांतिकाल आत्मघाती कदम हो सकता है जो कमजोर पड़े संगठन को दुबारा सुव्यवस्थित करने का अवसर देने वाला होगा, इसलिए शांतिवार्ता की नींव तभी रखी जा सकती है, जब माओवादी हथियारों के साथ आत्मसमर्पण करने एवं भविष्य में ऐसे किसी भी सशस्त्र संघर्ष का भाग ना बनने के संकल्प के साथ सामने आएं, जो माओवादियों द्वारा अब तक खींची गई राजनीतिक रेखा को देखकर तो दूर की कौड़ी ही दिखाई देती है।
तीसरा एवं सबसे मजबूत तर्क माओवाद प्रभावित क्षेत्रों में शांति स्थापित करने के क्रम में सामान्य जनमानस की भागीदारी को लेकर है जिसे लेकर ये शांतिदूत अपने प्रत्येक कुतर्क को तर्क बताने में रत रहते हैं, ये दावा करते हैं कि आज जो क्षेत्र माओवादी विचारधारा की जद में हैं, उस पर विशेषाधिकार यहां के स्थानीय समुदाय का है जिसकी इस प्रक्रिया में व्यापक भागीदारी होनी चाहिए, यह तर्क मजबूत दिखाई पड़ता है आखिर इन क्षेत्रों में जहां शताब्दियों से जनजातीय संस्कृति रची बसी एवं विकसित हुई है पर उनका विशेषाधिकार एवं यहां लाई जाने वाली किसी भी शांति प्रक्रिया में उनकी भागीदारी न्यायोचित जान पड़ती है, यहां बस मूल प्रश्न यह है कि दशकों से बंदूकों के साये में जीने को बाध्य किये गए भोले भाले लोग जिनका एक छोटा सा धरा अब अतिवादी विचारों के गिरफ्त में है को आप सीधे सीधे किसी भी शांति प्रक्रिया से कैसे जोड़ सकते हैं?
क्या इसके लिए इन क्षेत्रों को पहले भय मुक्त करना आवश्यक नहीं, क्या ये संभव नहीं कि आनन फानन में लाई गई इस शांति बहाली की प्रक्रिया में सामान्य जनमानस की भागीदारी उनके विरुद्ध सलवा जुडूम में तर्ज पर की गई लक्षित हिंसा की पुनरावृत्ति जैसी स्थिति को ही जन्म देगी, कम से कम वर्तमान स्थिति में जब परिवर्तित हुई रणनीति के तहत माओ के सिपाहियों की बंदूकें निर्दोषों पर जमकर बरस रही हैं वहां तो ऐसा कोई भी कदम इन सामान्य नागरिकों को लक्षित हिंसा एवं रक्तपात की ओर दुबारा ढ़केलने वाला ही होगा, जहां तक बात उस एक धरे की जनभावनाओं का है जो अब इस हिंसक विचार के गिरफ्त में है तो इस कथित प्रायोजित शांति प्रक्रिया में उनकी भागीदारी को स्वीकृति देना बिल्कुल वैसा ही है जैसे कश्मीर में आतंकियों के समर्थन में नारे बुलंद करने वालों को बातचीत के मेज पर लाना जिसकी किसी प्रभुसत्ता सम्पन्न लोकतांत्रिक देश में तो अनुमति कतई नहीं दी जा सकती।
हां इसमें भी संदेह नहीं कि इस अतिवादी विचारों की जद में आकर दिग्भ्रमित हुए लोग जो उन्मादी क्रांति की सनक में जंगलो में रहकर बेहद ही कठिन परिस्थितियों में सशस्त्र संघर्ष को आगे बढ़ा रहे उन्हें मुख्यधारा से जुड़ने का अवसर निश्चित ही दिया जाना चाहिए जिसे सरकार विभिन्न अभियानों (लोन वराटू एवं पूना नार्कोम) एवं पुनर्वास नितियों के तहत आगे भी बढ़ा रही है और मोटे तौर पर अब तक यह सफल भी रही है, इसलिए शांति के लिए प्रयासरत इन स्वघोषित झंडेबरदारों को चाहिए कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के अधीन वैधानिक प्रक्रिया के तहत लाई गई सरकार की इन नीतियों को पुरजोर समर्थन दें, उसमें अपनी सहभागिता दिखाएं, जहां तक बात इन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के विशेषाधिकार से संबंधित है तो इसमें संशय नहीं कि भारत की संप्रभुता एवं अखंडता अक्षुण्ण रखते हुए लोकतांत्रिक प्रक्रिया से आने वाले प्रत्येक सुझाव एवं इसके वैधानिक क्रियान्वयन का समुचित अधिकार तो संविधान में निहित ही है, इसके लिए तो केवल स्वस्थ लोकतांत्रिक भागेदारी की आवश्यकता है, इसके लिए शांति के नाम पर निजी महत्वाकांक्षाओं को सिर माथे पर ओढ़कर ऐसे क्षद्म स्वरूप लेने की क्या आवश्यकता कॉमरेड ?
जय जय भारत ।
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