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असली सवाल तो कुछ और ही है, तालिबानी गुंडों को उसी सवाल का जवाब बहुत महंगा पड़ने वाला है।

ज्ञात रहे कि अफगानिस्तान में तालिबानी गुंडों की संख्या 70 हजार बतायी जा रही है। यदि इस संख्या को दोगुनी भी मान लिया जाए तो यह डेढ़ लाख हो जाती है। इनके परिवार के सदस्यों की संख्या जोड़ ली जाए तो इनका कुनबा अधिकतम 10 लाख के करीब होगा। अभी तक अपने कुनबे के इन दस लाख लोगों की रोटी बोटी और हथियारों का इंतिज़ाम ये तालिबानी गुंडे ड्रग्स की तस्करी के द्वारा करते रहे हैं। 2017 में अफगानिस्तान के इतिहास में सबसे ज्यादा अफीम का उत्पादन हुआ था। उस वर्ष अफगानिस्तान में पैदा हुई कुल 9900 टन अफीम से बनी ड्रग्स की कीमत लगभग 140 करोड़ डॉलर, अर्थात लगभग 10360 करोड़ रुपये थी। 10 लाख लोगों के लिए इतनी रकम पर्याप्त थी। लेकिन अब जब 4 करोड़ अफगानिस्तानियों की रोटी पानी और अन्य सभी न्यूनतम नागरिक सुविधाओं की जिम्मेदारी इन तालिबानी गुंडों के पास आ गयी है तो क्या 140 करोड़ की अवैध ड्रग्स के काले धंधे से अफगानिस्तान का काम चल पाएगा.?
यह सवाल सर्वाधिक महत्वपूर्ण क्यों है, अब इसका कारण भी समझिए।
अपनी पिछली एक पोस्ट में लिख चुका हूं कि अफगानिस्तान पर तालिबानी गुंडों का कब्जा पहली बार नहीं हुआ है। 1996 से 2001 तक अफगानिस्तान इन्हीं तालिबानी गुंडों के कब्जे में था। लेकिन तब और अब की स्थिति में जमीन आसमान का अंतर हो चुका है। 
उस समय इन तालिबानी गुंडों की हैसियत अमेरिका के पालतू कुत्तों की थी। इसलिए अमेरिका इनका पूरा ख्याल रखता था। अमेरिकी खेमे वाले दर्जनों पश्चिमी देश समेत अरब देश भी इन गुंडों को अपने बॉस का पालतू कुत्ता समझकर तालिबानी गुंडों की रोटी बोटी का विशेष ख्याल रखते थे। इसके अतिरिक्त 1947 के बाद से ही अमेरिका का "वेरी वेरी स्पेशल" पालतू कुत्ता बनकर खरबों अमेरिकी डॉलरों की खैरात और कर्ज लीलता रहा वो पाकिस्तान भी इन तालिबानी गुंडों की मदद करता रहता था। अफगानिस्तान के खनिजों सहित कई अन्य उत्पादों के व्यापार से भी यह गुंडे कमाई किया करते थे।
लेकिन इसबार हालात बिल्कुल बदले हुए हैं। अमेरिका समेत उसके सारे मित्र देश अब इन तालिबानी गुंडों की तरफ देखना या थूकना भी नहीं चाह रहे हैं। अतीत में इनका मददगार रहा पाकिस्तान आज भिखमंगई की उस कगार पर खड़ा है कि अपना खर्चा चलाने के लिए प्रधानमंत्री निवास तक किराए पर उठा चुका है। इनकी करतूतों को देख कर यह बिल्कुल स्पष्ट हो रहा है कि बहुत जल्दी ही इनपर अंतरराष्ट्रीय आर्थिक प्रतिबंधों का हंटर भी बरसने वाला है। अतः खनिजों समेत इनके उत्पादों का विदेशी व्यापार ठप्प ही रहेगा। एक चीन ऐसा देश है जो इनकीं मदद कर सकता है लेकिन पूरी दुनिया पिछले 3 वर्षों से यह सच देख सुन रही है कि लगभग चौथाई पाकिस्तान को चीन अपने पास गिरवी रख चुका है इसके बावजूद पाकिस्तान की दाल रोटी अरब देशों की खैरात और उधार के दम पर ही चल रही है।
अफगानिस्तान पर कब्जे के दावेदार तालिबानी गुंडों के ही 3 और गिरोह भी कल सामने आ कर ताल ठोंक चुके हैं। अतः अब अफगानिस्तान की दाल 4 गिरोहों के जूतों में बंटेगी। इनमें से कम से कम 2 गिरोह पाकिस्तान पर भी झपट्टा मारेंगे, यह भी बिल्कुल निश्चित है।

अतः अब असली और सबसे कठिन सवाल तो यही है कि अफगानिस्तान की दाल रोटी कैसे चलेगी.? 
ध्यान रहे कि भूखे पेट वाली भीड़ दुनिया की सबसे खतरनाक और आदमखोर ताकत होती है। जिसका सामना अफगानिस्तान में इन तालिबानी गुंडों को बहुत जल्दी करना पड़ेगा। इसलिए न्यूजचैनलों पर हो रहीं "ये हो जाएगा, वो हो जाएगा," परपंच वाली डरावनी पंचायतों खबरों से विचलित मत होइए और अब शुरू होने  जा रहे खेल को देखते जाइए... अभी तो पार्टी शुरू हुई है।

जय जय भारत ---- 🙏

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