Blog #26#

आज प्रातः भीलवाड़ा से अजमेर जाते समय राजस्थान पथ परिवहन निगम बस में मेरा एक युवती से संवाद हुआ , जो भारत के अंदर जन्मे एक पंथ को मानने वाली थी। 

उसने मुझसे कहा कि एक नहीं बल्कि कई वजहें हैं; जिसके आधार पर मैं ये मानती हूँ कि हमलोग 'हिन्दू' नहीं हैं। मैंने उससे कहा तो फिर ऐसी वजहों के बारे में मैं तुमसे जरूर जानना चाहूँगा। उसने कहा- हमारे पंथ के प्रवर्तक न तो मूर्ति पूजा करते थे और न ही इसे उचित मानते थे, इसलिए मैं हिन्दू नहीं हूँ।
 
मैंने कहा- अगर ऐसा है तो फिर सबसे पहला नाम जो मेरे सामने आता है वो है महर्षि दयानंद सरस्वती का, जो न तो स्वयं मूर्तिपूजक थे और न ही उन्होंने कभी किसी को इसके लिए प्रेरित किया; बल्कि अगर तुम उनके द्वारा रचित कालजयी कृति “सत्यार्थ प्रकाश" पढ़ोगी तो तुम्हें पता चलेगा कि उस ग्रंथ में उन्होंने मूर्तिपूजा की जितनी निंदा की है; उतनी निंदा तो मूर्ति पूजा के किसी भी निंदक ने नहीं की होगी पर मैंने तो आजतक इस बात को न तो माना और न ही किसी से सुना कि दयानंद सरस्वती हिन्दू नहीं थे क्योंकि हम ये मानते हैं कि हिन्दू होने अथवा हिन्दू न होने का मूर्तिपूजा या किसी उपासना पद्धति से कोई भी संबंध नहीं है।

उसने आगे कहा- चलो मूर्ति पूजा छोड़ो पर हमारे प्रवर्तक ने ‘निराकार ईश्वर’ की उपासना का निर्देश दिया। अब तुम ये जरूर कहोगे कि फिर तुम्हारे ग्रंथ में राम और कृष्ण का नाम क्यों आया है तो इसका जबाब भी मैं पहले दे देती हूँ, राम और कृष्ण निराकार परमात्मा का एक नाम है न कि ये वो राम और वो कृष्ण हैं जिनको तुम लोग मानते हो। 

मैंने उससे पूछा- तुमने असम के संत श्रीमंत शंकर देव जी का नाम सुना है? उसने इंकार में सर हिलाया तो मैंने उससे कहना शुरू किया- अगर तुमने उनके बारे में पढ़ा होता तो ये बात कभी नही कहती कि ईश्वर के निराकार रूप की उपासना करने के कारण मैं हिन्दू नहीं हूँ; क्योंकि आज से लगभग पाँच सौ साल पहले हुए इस संत ने असम में जिस नव वैष्णवपंथ की धारा बहाई थी वो कृष्ण के निराकार रूप की उपासना थी जिसमें मूर्ति पूजा का प्रावधान नहीं था। उनके धार्मिक उत्सवों के समय केवल एक पवित्र ग्रंथ चौकी पर रख दिया जाता है, इसे ही नैवेद्य तथा भक्ति निवेदित की जाती है और वहां वो लोग ताल, खोल आदि से निर्गुण ईश्वर के उपासना के गीत गाते हैं ठीक उसी तरह जैसे तुम्हारे यहाँ परंपरा है पर श्रीमंत शंकर देव जी, उनका पंथ और असमिया समाज हिन्दू ही है; मूर्ति पूजा न करने से वो अहिंदू तो नहीं हो गए। 

उसने फिर कहा- चलो इस बात को छोड़ो पर ये तो सत्य है न कि हमलोग वेदों को नहीं मानते फिर हमारे हिन्दू होने का सवाल ही पैदा नहीं होता। मैंने उससे मुस्कुराते हुए कहा- हिन्दू धर्म में कुछ भी मानना अथवा न मानना हिन्दू होने की कोई कसौटी नहीं है; क्योंकि हिन्दू धर्म में ज्ञान और ग्रंथों की कोई सीमा नहीं है, वेदों के बाद ब्राह्मण ग्रंथ रचे गये, फिर उपनिषद् आये, महाकाव्य और पुराण रचे गये। जाहिर है इन ग्रंथों को रचने वालों को वेदों के अलावा भी ज्ञान को और विस्तृत या सहज करने की आवश्यकता महसूस हुई होगी तो उन्होंने ये ग्रंथ रचे पर हमने कभी उनसे नहीं कहा कि वेद ही अंतिम सत्य है तो तुम और किताबें क्यों लिख रहे? और ये तो कुछ भी नहीं है, हमारे यहाँ तो वेद निंदक चार्वाकों को भी ऋषि ही माना गया है; इसलिए वेदों को न मानते हुए भी कोई हिन्दू हो सकता है। 

उसने फिर कहा, देखो ! हमारे जो प्रवर्तक थे, उन्होंने जनेऊ पहनने से मना कर दिया था, इसलिए हम हिन्दू नहीं हैं। मैंने उससे कहा- यानि तुम्हारा ये कहना है कि कर्मकांडों को न करने वाला हिन्दू नहीं हो सकता ? उसने कहा- बिलकुल ! ऐसा ही है। 

मैंने उससे कहा- चलो एक बात बताओ ! हिन्दू धर्म के वर्तमान स्वरूप के श्रेष्ठ प्रवक्ता के रूप जो मान्य हैं, उनका नाम क्या है? उसने छूटते ही उत्तर दिया- स्वामी विवेकानंद ! मैंने कहा- हिन्दू धर्म से विवेकानंद को निकाल दो तो क्या हिन्दू धर्म रहेगा? उसने कहा- हाँ ! बिलकुल रहेगा…..मैंने अगला प्रश्न किया, थोड़ा और पीछे जाओ और हिन्दू धर्म से गोस्वामी तुलसीदास को निकाल दो जिन्होंने रामचरितमानस लिखी थी, तो क्या हिन्दू धर्म बचेगा? उसने कहा, हाँ बचेगा ! मैंने फिर प्रश्न किया, थोड़ा और पीछे जाओ और हिन्दू धर्म से आदि शंकराचार्य को निकाल दो और बताओ कि क्या तब हिन्दू धर्म बचेगा? उसने कहा, हाँ ! तब भी बचेगा। मेरा अगला सवाल था- अब लगभग 5200 साल पीछे जाकर अगर मैं हिन्दू धर्म से कृष्ण को निकाल दूँ तो क्या हिन्दू धर्म बचेगा? उसने कहा, हाँ ! मैंने कहा यानि तुम ये मान रही हो कि कृष्ण निकलेंगे तो उनके साथ श्रीमदभगवद गीता भी निकल जायेगी और तब भी हिन्दू धर्म बचा रहेगा? उसने थोड़ा सकुचाते हुए कहा- हाँ ! मैंने अगला प्रश्न किया, अब सीधे त्रेता युग में चली जाओ और जाकर हिन्दू धर्म से श्रीराम को निकालकर बताओ कि तब हिन्दू धर्म रहेगा कि खत्म हो जायेगा? उसने कहा, हाँ रहेगा! 

मैंने कहा- हाँ ! तब भी हिन्दू धर्म रहेगा क्योंकि वाल्मीकि रामायण में श्रीराम जी से पहले के उनके 64 पूर्वजों का नाम आता है, जो सबके सब हिन्दू थे।

इसके बाद मैंने उससे कहना शुरू किया- मत्स्य अवतार भगवान विष्णु का पहला अवतार है। इस अवतार में विष्णु जी मत्स्य रूप में अवतरित हुए थे। मान्यता के अनुसार एक राक्षस ने जब वेदों को चुरा कर समुद्र की गहराई में छुपा दिया था, तब भगवान विष्णु ने मत्स्य अवतार में आकर वेदों को पाया और उन्हें फिर स्थापित किया और तुमको ये पता होना चाहिए कि वेदों की चोरी हो जाने के बाद भी हिन्दू धर्म शेष था। हमारे धर्म को पूर्ण इसलिए माना गया है कि यहाँ से ये सब कुछ निकाल दो तो भी इसकी पूर्णता में कोई कमी नहीं आएगी। अब देखो! हिन्दू धर्म से विवेकानंद को, तुलसीदास को, उनके साथ रामचरितमानस को, आदि शंकराचार्य को, श्रीकृष्ण और उनकी गीता को, श्रीराम को तथा अन्य ग्रंथों को निकाल देने की बात कही तब भी तुमको ये कहना और मानना पड़ा कि हिन्दू धर्म तब भी बचा हुआ है तो ये किसी के द्वारा जनेऊ पहनने या न पहनने अथवा किसी रीति-रिवास या कर्मकांड को मानने अथवा न मानने पर कैसे अवलंबित हो सकता है? ये तो अनादि काल से चला आ रहा सृष्टि धर्म है, इसलिए ये किसी भी चीज का मोहताज नहीं है। 

भारत में इतनी विविधतायें हैं, हरेक प्रदेश अथवा कई बार तो किसी प्रदेश के अंदर भी कई तरह के रीति-रिवाज और परम्परायें चलन में हैं जो एक-दूसरे से नितांत भिन्न है तो इसका अर्थ ये थोड़े है कि उनमें से एक हिन्दू है और दूसरा हिन्दू नहीं है। हिंदुओं में से ही कई हैं जो जनेऊ नहीं पहनते, कई धोती नहीं पहनते, कईयों की पूजा-पद्धति एक-दूसरे से अलग है, विवाह तथा दूसरे संस्कारों और अनुष्ठान की विधियों में अंतर है, कुछ गुरुओं और संतों को मानते हैं पर सब हिन्दू ही हैं और इसलिए जिसे लोग “विविधता में एकता” कहते हैं, उसे मैं “विविधता में एकात्मता” कहता हूँ क्योंकि विविधताओं के बाबजूद जो सम्मिलित नाद सबमें एक समान सुनाई देता है वो नाद “हिन्दू धर्म” है। हमारी दृष्टि में हर वो व्यक्ति हिन्दू है जिसके अस्तित्व से इस जगत को, मानव जाति को, जीव-जंतुओं को और पर्यावरण को कोई खतरा नहीं है और जिसकी भावना केवल और केवल दु:खों से संतप्त प्राणियों का कल्याण करना है। हमारे यहाँ कहा गया है:- 

"न त्वहं कामये राज्यं न स्वर्गं नापुनर्भवम् / कामये दुःखतप्तानां प्राणिनामार्तिनाशनम्॥"

अर्थात्, 

“मैं राज्य की कामना नहीं करता, मुझे स्वर्ग और मोक्ष नहीं चाहिए। दुःख में पीड़ित प्राणियों के दुःख  दूर करने में सहायक हो सकूँ, यही मेरी कामना है।”

तुमको शायद ये नहीं पता हो पर सत्य ये है कि हिन्दू होने के लिए किसी कर्मकांड अथवा मान्यता को मानने जैसी कोई भी शर्त या बाध्यता हमारे यहाँ नहीं है और अगर कुछ है भी तो वो है सर्व प्राणियों के कष्टों के निवारण की भावना का विकास। और ये भावना यकीनन तुममें भी है; यानि मेरी दृष्टि में और हिन्दू धर्म की परिभाषा में तुम हिन्दू ही हो पर अब ये तुमको तय करना है कि तुम स्वयं को क्या मानती हो। अगर तुम अपने प्रवर्तक के द्वारा केवल किसी कर्मकांड को संपादित करने से इंकार करने, मूर्ति पूजा न करने और वेदों को न मानने को ही अपने हिन्दू न होने का आधार मानती हो तो फिर ऊपर के सारे उद्धरण तुम्हारे लिए जबाब हैं।

जय जय भारत ---- 🙏

Comments

Popular posts from this blog